Tuesday, June 26, 2018

Neem Karoli Baba Miracles in Hindi, Neem Karoli Baba Stories part 2

There are many incidences and real stories about Neem Karoli Baba that are very interesting and good to hear and these interesting stories are enough to describe the majestic aura of the Neem Karoli Baba and can make anyone incline towards Neem Karoli Baba.
These interesting stories were known in today's times either by the Neem Karoli Baba's contemporary devotees or by the descendants of those devotees.
Let's know some life stories of Shri Shri Neem Karoli Maharaj


Neem Karoli baba miracles in hindi




Neem Karoli Baba Miracle/ Story 2-

[-from Rabboo Joshi, “I and My Father are One,” (2009), p. 7

God Came and Sat in My Heart


May 1958, Home of Chandra Lal Sah, Nainital.


In the morning at 4 a.m., the ladies started doing Aarti of Neem karoli Babaji.

My uncle [Puran Da (“Kakka”)] woke me up. For a young man of 18 years, it was not a very pleasant idea. Without showing [it] outwardly, I grudgingly got up and went near him. Someone put the Aarti [lamp] in my hand and I waved as everyone was doing. I did my turn and passed [it] on to others. I sat down a little distance from him. His face was radiating [a] divine glow, happy and loving. You did not feel like taking your eyes off his face.
When the Aarti ceremony was over, Neem Karoli Baba looked at me and beckoned me. I got up, went and sat near him. Baba said, “THIS BOY IS THINKING THAT BABA IS NEITHER SPEAKING TO ME NOR HE IS LETTING ME GO.” With this, he gave a firm and loud pat on the back of my head.
What happened to me next were a simultaneous series of emotional explosions. I started shedding silent tears in streams, and the wrenching in my heart was incredibly delicious – the total quieting of my mind and my thoughtless realization of the giant void created in the ethereal presence of the Master.
There was no longer need for a Guru – God came and sat in my heart, pervaded every fiber and cell of my being. All divine incarnations, all prayers or incantations ever made in any religion or any language, were completely encapsulated in that "pat" at 4 a.m., and the chip that was implanted at that moment finished all the dualistic experiences I might have had to undergo at various stages of my spiritual journey.


Hindi Translation- त्रिभुवन प्रकाश द्वारा 



भगवान आए और मेरे दिल में विराजे।
मई 1958, चंद्र लाल शाह का घर, नैनीताल।

सुबह सुबह 4 बजे, महिलाओं ने नीम करोली बाबा महाराजजी की आरती करना शुरू कर दिया था। मेरे (रब्बू जोशी) चाचा, पुरण दा उर्फ़ कक्का, ने मुझे जगा दिया। 18 साल के एक नवयुवक के लिए, यह एक बहुत सुखद अनुभव नहीं था। बिना इसे बाहर दिखाए हुए, मैं बेमन से उठकर उनके पास चला गया। किसी ने आरती का दिया मेरे हाथ में रख दिया मैंने भी इसे हवा में घुमाया जैसे हर कोई कर रहा था। मैंने अपनी बारी पूरी की और इसे दूसरों की तरफ बढ़ा दिया। मैं उनसे थोड़ा दूर बैठ गया। उनका चेहरा एक दिव्य प्रकाश बिखेर रखा था, ख़ुशी और प्यार से प्रेरित। महाराजजी के चेहरे से अपनी नज़रें हटाने का ख्याल भी दिमाग में नहीं आता था।
जब आरती की रस्म पूरी हुई, तब महाराजजी ने मुझे देखा और इशारे से मुझे बुलाया। मैं उठा और उनके पास जाकर बैठ गया। महाराजजी ने कहा, "यह लड़का सोच रहा है कि ना तो बाबा मुझे से बात कर रहे हैं और ना ही मुझे जाने दे रहे हैं।" इसके साथ, उन्होंने मेरे सर के पिछले हिस्से में मजबूती के साथ एक जोर की थपकी दी।
इसके बाद मेरे साथ जो हुआ वो एक के बाद एक होने वाली भावनात्मक विस्फोटों की एक श्रृंखला थी। मेरे नेत्रों से शांत अश्रुओं की धारा बह निकली, और मेरे हृदय में हुई ऐंठन अविश्वसनीय रूप से मनोहारी लगी-मेरे दिमाग में छायी पूर्ण शान्ति और विचाररहित विशाल शून्यता की अनुभूति हुई जो गुरु की अलौकिक उपस्थिति से बनी थी।
अब गुरु की आवश्यकता नहीं रह गई थी- भगवान आये और मेरे दिल में विराजमान हो गए, मेरे अस्तित्व की हरेक तंत्रिका और कोशिका में व्याप्त हो गए। सभी दैवीय अवतार, सभी प्रार्थनाएं या मंत्रोच्चार जो कभी भी किसी धर्म या किसी भाषा में रची गयी थी वो सभी उस ४ बजे सुबह की थपकी में सम्पुटित थे और उस क्षण में जो चिप मुझमें प्रत्यारोपित किया गया था उसने सभी द्वैतवादी अनुभवों को समाप्त कर दिया था जिनका अनुभव मुझे अपनी आध्यात्मिक यात्रा के विभिन्न चरणों में होता।



Neem Karoli baba miracles in hindi



Neem Karoli Baba Miracle/ Story 3-
[- from Ravi Prakash Pande (Rajida), “The Divine Reality” 2nd ed. (2005), pp. 311-313.


I am still in Kaichi, An Offering Of Kachauris-
One of the mothers from Bhowali used to come to Kainchi every Tuesday when Baba was there to offer him kachauris [stuffed deep-fried bread]. The kachauris were simple and made with love. Baba ate them with relish and called the woman Kachauri Mai.
In September 1973, thinking that Baba was no longer alive, she discontinued her routine. However, in February 1976 she had a dream in which she was standing with the empty plate on which she used to offer her kachauris to Baba. Baba took the empty plate from her and said, "YOU HAVE NOT BROUGHT KACHAURIS. YOU THINK I AM NOT ALIVE. I STILL LIVE AT KAINCHI. YOU MUST BRING KACHAURIS." The woman woke up and decided to continue her previous routine again starting the next Tuesday.
On that Tuesday it was snowing all over the hills. Taking the kachauris with her, she reached Kainchi, where all the rooms of the ashram were locked and only the temples were open. She saw that the door on the northeast side of Baba's kuti was ajar. She pushed it open further with her hand, and with one foot inside the doorsill and the other outside, she just glanced over at Baba's takhat. She was wonderstruck when she saw Baba sitting on it in human form. Both his hands were placed on the takhat, and his feet rested on the floor as if he were waiting for someone. She ran out, all the way back home, and remained in an unbalanced state of mind for about three months. Finally Sri Ma persuaded her to start her routine again. She recovered from her shock and once again began offering kachauris.
Hindi Translation- त्रिभुवन प्रकाश द्वारा मैं अब भी कैंची में ही रहता हूँ।

भोवाली (भवाली) से आने वाली एक मां हर मंगलवार को कैंची (कैंची धाम, नैनीताल) आती नीम करोली बाबा के लिए कचोरियाँ ले कर, जब तक बाबा वहां थे। कचोरियाँ साधारण और प्यार से बनायीं गयी होती थी। बाबा उन्हें स्वाद ले कर खाते थे और उन महिला को कचौरी माई कह कर बुलाते थे।
सितंबर 1973 में यह सोचकर कि बाबा अब जीवित नहीं हैं, उन्होंने अपने इस दस्तूर को बंद कर दिया। ऐसा होने पर भी, फरवरी 1976 में उन्होंने एक सपना देखा जिसमें वो वह खाली थाली ले कर खड़ी थी जिसमे वो बाबा को अपनी कचोरियाँ अर्पित करती थी। बाबा ने खाली थाली उनसे ले ली और कहा, "तुम कचोरी लेकर नहीं आयी। तुम सोचती हो मैं जीवित नहीं हूं। मैं अब भी कैंची में ही रहता हूँ। तुम्हें कचोरियाँ लेकर जरूर आना चाहिए।" वह महिला तुरंत नींद से जाग उठी और उन्होंने अगले मंगलवार से ही बाबा के लिए कचोरियाँ कैंची लेकर जाने वाले अपने पहले वाले नियम को जारी रखने का फैसला किया।
उस दिन मंगलवार को पहाड़ों पर हर तरफ बर्फ गिर रही थी। अपने साथ कचोरियाँ लेकर वो कैंची पहुंची, जहां आश्रम के सभी कमरों के दरवाज़े बंद थे और केवल मंदिर खुले थे। उन्होंने देखा कि आश्रम की पूर्वोत्तर दिशा में स्थित बाबा की कुटी का दरवाज़ा कुछ कुछ खुला था। उन्होंने अपने हाथ उसे धकेल कर थोड़ा और खोला और एक पैर देहरी से अंदर और दूसरा पैर बाहर रखे हुए ही, बाबा के बैठने के तख्त पर सरसरी नज़र मात्र डाली।
वो स्तब्ध रह गई जब उन्होंने बाबा को अपने मानवीय शरीर में वहां बैठे देखा। बाबा के दोनों हाथ तख़्त पर थे और उनके दोनों पैर जमीन पर थे मानो वो किसीका इंतज़ार कर रहे थे। वो तुरंत बहार निकल कर अपने घर कि तरफ वापस दौड़ पड़ी, और लगभग तीन महीने तक मानसिक तौर पर अशांत रहीं।
बाद में श्रीमाँ ने उन्हें फिर से कचोरियाँ लाने के उनके नियम को शुरू करने के लिए मनाया। इस तरह से वो अचानक घटी इस घटना के सदमे से बाहर आयी और फिर से बाबा को कचोरियाँ अर्पित करने लगी।


External Links-

All about Kainchi Dham of Neem Karoli Maharaj


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